नीली आभा!

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भारत में हड़प्पा एवं मोहन जोदड़ो सभ्यता से लेकर गुप्तकाल तक ग्लेज किए हुए बर्तनों व माला की मनकों का प्रचार रहा किंतु बौद्धकाल में इस कला का पतन हो गया। वहीं ईरान में चमकदार मिट्टी के बर्तनों की बड़ी उन्नति हुई और नीला रंग होने से इस्लाम के साथ इसका अच्छा मेल हो गया। ईरान में गिल-ए-लाजवर्त का आविष्कार करके चमकदार मिट्टी के बर्तन बनाने की कला को जैसे चार चांद लगा दिए। अरब के व्यापारी गिल-ए-लाजवर्त को भारत में अजमेर से ख़रीदते और चीन में बेचते थे। चूंकि अरब मुस्लिम व्यापारी चीन में नीले रंग के बर्तन बेचते थे अतः इसका नाम मुस्लिम ब्लू पड़ गया था।

गौरवषाली अतीत

नीली आभा वाले इन पात्रों को ब्लू पाॅटरी कहना अंग्रेज़ों की ही देन है। ईरानी भाषा में तो इसे संगीने या आतीके और इसके कारीगर को संगीनेसाज़ या आतीकेसाज़ कहा जाता है। ईरान से यह कला अफ़गानिस्तान होती हुई तत्कालीन भारत के मुल्तान व लाहौर षहरों सहित दिल्ली तथा आगरा में आई। भारत के आख़िरी मुग़ल बादषाह बहादुरषाह जफ़र के समय दिल्ली में एक ईरानी संगीनेसाज़ काम करता था। इसी संगीनेसाज़ से दिल्ली के भोला कुम्हार ने इस कला को सीखा और उसे अपने परिवार की विरासत बनाया। जयपुर के तत्कालीन महाराजा सवाई रामसिंह कलाप्रेमी थे। उन्होंने दूर-दूर से कलाकारों और षिल्पियों को जयपुर बुलाकर आश्रय दिया। इसी क्रम में उन्होंने अचनेरा के दो कुम्हारों – चूड़ामणि और कालूराम को दिल्ली भेजकर भोला कुम्हार से नीले बर्तन बनाने का प्रषिक्षण लेने की व्यवस्था की। काम सीखकर जब वे जयपुर लौटे तो उन्हें अजबघर (आज का स्कूल आॅफ़ आर्ट) में पाॅटरी विभाग का अध्यक्ष बना दिया गया। सन 1952 में स्कूल आॅफ़ आर्ट में सभी प्रकार के हस्तषिल्प बनाने बंद कर दिए गए थे। करीब एक दषक बाद जयपुर के पùश्री कृपालसिंह षेखावत ने इस कला को पुनर्जीवित कर दूर-दूर तक इसकी ख्याति को प्रतिष्ठित किया। उन्हीं के षिष्य गोपाल सैनी ने अब इस कला को नए आयाम देकर एक बार फ़िर परवान चढ़ाया है।

“69ब्लू पाॅटरी में सुराही, थालियां, फूलदान, टाइलें एवं हाथी, मछली की आकृति का सामान देखने को मिलता है”

विविध प्रकार की वस्तुए

गोपाल सैनी मूलतः एक कलाकार हैं। उन्होंने ब्लू पाॅटरी में न केवल बड़े आकार के बर्तन बनाए हैं अपितु उन्हें वाटर प्रूफ बनाने, उनमें लाल रंग का समावेष और बर्तनों पर एम्बोस का कार्य भी किया है। सुराहीदार बर्तनों के स्थान पर उन्हें हड़प्पाकालीन आकारों में ढालकर तथा उन पर तत्कालीन जनजीवन से संबद्ध प्रतीकों का चित्रण कर उन्हें नया स्वरूप भी प्रदान किया है। बड़े आकार की चित्रित प्लेट, गोल, तिकोनी बोतलें, वाॅल हेंगिंग, बाॅर्डर टाइल्स, लाउंज की दीवार पर लगाने के लिए ब्लू पाॅटरी की टाइलों में विभक्त चित्ताकर्षक बणी-ठणी, वीर एवं श्रृंगार रस से ओत-प्रोत कथाएं आदि बनाकर तो जैसे उन्होंने एक नीलाभ संस्कृति को ही जन्म दे दिया है। ब्लू पाॅटरी को अब तक लगभग डेढ़ सौ छोटे-बड़े रूपाकारों में ढाल चुके गोपाल सैनी का मानना है कि यह कार्य जोखि़म भरा तो है ही, जटिल भी है। उन्होंने बताया कि ब्लू पाॅटरी के निर्माण में क्वाट्र्ज़ एवं देसी कांच का पाउडर, कतीरा, साजी और मुल्तानी मिट्टी की ज़रूरत होती है। चूंकि क्वाट्र्ज से चाक पर पूरा बर्तन एक साथ नहीं बनता अतः कई बार तो कल्पित रूप-आकार देने के लिए उसमें चार-पांच बार तक जोड़ने की प्रक्रिया संपन्न करनी पड़ती है। उसे सफेद बनाने के लिए उस क्वाट्र्ज़ एवं कांच के पाउडर का अस्तर चढ़ाया जाता है। सूखने पर बेल-बूटे चित्रित किए जाते हैं। ग्लेज़ की परत चढ़ाकर साढ़े सात सौ से लेकर आठ सौ डिग्री सेंटीग्रेड ताप से उन्हें भट्ठी में पकाया जाता है। इतने ऊंचे तापमान में पकाकर बर्तनों का सुरक्षित निकाल लेना इस कला के लंबे अनुभव तथा भट्ठी से निकलने वाली विभिन्न रंगों की लपटों के व्यावहारिक ज्ञान पर ही निर्भर करता है।

कारीगरी का कमाल
बर्तन से पानी न रिसे इसके लिए गोपाल सैनी ने उसमें काम आने वाले क्वाट्र्ज़ पाउडर, सफेद कांच, बोरिक एसिड, कतीरा और मुल्तानी मिट्टी के अनुपात में परिवर्तन किया है। इसी प्रकार उसे सीसा रहित बनाने के लिए उसमें हरे कांच के स्थान पर सफेद कांच, बोरेक्स आॅक्साइड, बोरिक एसिड, पोटेषियम नाइट्रेट तथा जिंक आॅक्साइड का प्रयोग किया है। यद्यपि जयपुर के नीले बर्तनों की मोहक छटा का जादुई सम्मोहन दूर-दूर तक फैला हुआ है। किंतु इस कला की सभी प्रक्रियाओं का लंबा अनुभव रखने वाले गोपाल सैनी का दृढ़ निष्चय है कि आने वाले समय में वह ब्लू पाॅटरी के क्षेत्र में कुछ ऐसा परिवर्तन करेंगे, जो इस कला को षिखर तक पहुंचा देगा।

बनाने की प्रक्रिया
ब्लू पाॅटरी के बर्तन तो सिंगल फायरिंग सिस्टम से पकाए जाते हैं किंतु इन्हें एक बार में नहीं बनाया जाता। अतः आकार और कार्य के अनुसार पांच बार से लेकर 42 बार तक की प्रक्रिया से गुज़रने के बाद ही बर्तन को अपना रूप मिल पाता है। भट्टी जमाना भी कौशल का काम है। कम से कम स्थान पर अधिक बर्तन रखकर ऊंचे ताप में पकाकर सुरक्षित बाहर निकाल लेना भट्टी विज्ञान के लंबे अनुभव पर निर्भर करता है। भट्टी से निकलने वाली विभिन्न रंगों की लपटें और उनका बर्तनों पर पड़ने वाले प्रभाव का ज्ञान भी अनुभव पर आधारित होता है।

गोपाल सैनी जो मूलतः राजस्थान ललित कला अकादमी से पुरस्कृत चित्रकार हैं, उन्होंने अपनी कल्पनाशीलत और प्रयोगधर्मिता से ब्लू पाॅटरी में न केवल बड़े आकार के बर्तन बनाए हैं बल्कि उन पर एम्बोस का कार्य व जयपुर की जाली-झरोखों का समावेश करके इस कला को परवान चढ़ाया है।

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