विकास के मायने और महात्मा गांधी

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यह वर्ष महात्मा गांधी की 150वीं जयंती का है। इस पावन अवसर पर हमें अपने विकास की षब्दावली को गांधी के विकास के पैरामीटर से मिलान करने की ज़रूरत है। गांधीजी ने अपने जीवन से दुनिया को जो संदेष दिया है वह धारण करने योग्य है। हम तभी विकास के सही मायने को समझ सकेंगे। प्रकृति के दोहन की प्रतिस्पर्धा ने हमें युद्ध की स्थिति पर ला खड़ा किया है। मनुष्य की उपभोग की प्रवृत्ति की ओर इषारा करते हुए गांधीजी कहते हैं, ‘‘दुनिया में ऐसे विवेकी पुरुषों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जो इस सभ्यता को, जिसके एक छोर पर तो भौतिक समृद्धि की कभी तृप्त न होने वाली आकांक्षा है और दूसरे छोर पर उसके फलस्वरूप पैदा होने वाला युद्ध है।’’

एक नई परिभाषा

वास्तव में हमारे महापुरुषों, विद्वानों,पर्यावरणविदांे ने यह महसूस करना आरंभकर दिया था कि अंधाधंुध विकास की अवधारणा के चलते प्राकृतिक संसाधनों पर इसका घातक प्रभाव पड़ेगा। विषेष रूप से पर्यावरण पर विपरीत प्रभाव और विकास के दुष्परिणामों को पर्यावरणविदों ने भांपना आरंभ कर दिया था। इन दुष्परिणामों में जल संसाधनों का अंधाधुंध दोहन,जैव विविधता आदि षामिल हैं। अमीरों और गरीबों के बीच बढ़ती खाई के चलते पर्यावरण के साथ-साथ समाज में भी असंतुलन पैदा होना आरंभ हो गया। इन सब स्थितियांे के कारण विकास की एक नई अवधारणा की खोज आरंभ हुई। ऐसा विकास, जिसमें समाज का हर वर्ग विकसित हो। लोगों का सर्वांगीण विकास हो, यह विकास स्थायी हो और व्यापक हो। विकास की परिभाषा को लेकर महात्मा गांधी बड़े सजग और सतर्क थे। वह जानते थे कि विकास के नाम पर चल रही यह दौड़ अनेक समस्याओं को जन्म देगी, जिसे संभालना मुष्किल हो जाएगा। उन्होंने कहा, ‘‘मैं यह कहने का साहस करता हूं कि यूरोपीय लोगों को अपने दृष्टिकोण पर पुनर्विचार करना होगा। आज पूरी दुनिया में पर्यावरण को लेकर चिंता जतायी जा रही है। चिंता का विषय हमारे सामने क्यों आया इसकी पड़ताल करने की ज़रूरत है। हमने प्रकृति का अपने लालच के लिए दोहन करना षुरू कर दिया है। प्रकृति के मूल स्वरूप को बिना नष्ट किए हम अपनी लिप्सा पूरी नहीं कर सकते। हम जिसे विकास मानकर अपनी पीठ थपथपा रहे हैं वह कहीं पृथ्वी के विनाष का मूल कारण न बन जाए।’’

जताई चिंता
ब्रिटेन में एक व्यक्ति जितना उपभोग करता है, अगर दुनिया का हर व्यक्ति इतना ही उपभोग करे तो सब की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए हमें धरती जैसे तीन ग्रहों की आवष्यकता होगी। विकास सर्वांगीण मानव सभ्यता के लिए है, जिसमें मनुष्य की मनुष्यता के लिए विषेष स्थान है। हिंद स्वराज में गांधी कहते हैं,‘‘ पहले तो हम यह सोचें कि सभ्यता किस हालत का नाम है। इस सभ्यता की सही पहचान तो यही है कि लोग बाहरी दुनिया की खोज मंे और षरीर के सुख में धन्यता, सार्थकता और पुरुषार्थ मानते हैं। इसकी कुछ मिसालें लें-‘‘सौ साल पहले यूरोप के लोग जिस प्रकार के घरों मंे रहते थे उनसे ज़्यादा अच्छे घरों में आज वे रहते हैं, यह सभ्यता की निषानी मानी जाती है। इसमंे षरीर के सुख की बात है। इससे पहले लोग चमड़े के कपड़े पहनते थे और भालांे का इस्तेमाल करते थे। अब वे लंबे पतलून पहनते हैं और षरीर को सजाने के लिए तरह-तरह के कपड़े बनवाते हैं। भाले के बदले एक के बाद एक पांच गोलियां छोड़ सकें, ऐसी चक्र वाली बंदूक का इस्तेमाल करते हैं। यह सभ्यता की निषानी है।’’ इस तरह की सभ्यता ने मनुष्य से मनुष्य को दूर कर दिया है और हम ज़्यादा विध्वंसक हो गए हैं। हमने विनाषक षक्तियों को बढ़ावा देने का काम किया है। आज पूरी दुनिया युद्ध के मुहाने पर खड़ी है।

महात्मा गांधी का मानना था कि विकास की प्रचलित मान्यताएं दुनिया के सामने संकट उत्पन्न करेंगी

शांति का सन्देश

षांति और सद्भाव द्वारा हम दुनिया में अमन और चैन कायम कर सकते हैं। षांति कायम करने के लिए सबसे आवष्यक तत्त्व है कि हम सीमित संसाधनों में अपने जीवन को बेहतर तरीके से जीना सीखें। हम अपनी ज़रूरत जैसे-जैसे बढ़ाते जाते हैं, दूसरों के हक पर अपनी बढ़त बनाते जाते हैं। यहां दूसरों के हक का तात्पर्य है कि हम उस अंतिम आदमी को दरकिनार कर रहे हैं, जिसे सबसे ज़्यादा संसाधनों की आवष्यकता है। यहां यह गौर करने लायक बात है कि कम से कम संसाधन के उपयोग से हम अपने आने वाली पीढ़ी के लिए कुछ छोड़ जाएंगे। भारत की सभ्यता में सदैव वसुधैव कुटुम्बकम की भावना सम्मिलित रही है। भारतीय सभ्यता के विषय में अपनी पुस्तक हिंद स्वराज में गांधीजी कहते हैं, ‘‘मैं मानता हूं कि जो सभ्यता हिन्दुस्तान ने दिखाई है, उस तक दुनिया में कोई नहीं पहुंच सकता। जो बीज हमारे पुरखों ने बोए हैं, उसकी बराबरी कर सकें, ऐसी कोई चीज़ देखने में नहीं आई। रोम मिट्टी में मिल गया, ग्रीस का सिर्फ नाम रह गया, मिस्र की बादषाहत चली गई। जापान पष्चिम के षिकंजे मंे फंस गया। लेकिन गिरा-टूटा जैसा भी हो, हिंदुस्तान आज भी अपनी बुनियाद में मज़बूत है।’’
21वीं सदी में गांधीजी के बताए रास्ते पर चलकर ही हम सतत् विकास को पा सकते हैं। अमीरी और गरीबी के बीच की खाई को कम कर सकते हैं। सबको सम्मानजनक जीवन जीने का अवसर मिलेगा। साथ ही हम आने वाली पीढ़ी के लिए भी संसाधनों को संजोकर रख सकते हैं। प्रकृति को बिना नुकसान पहंुचाए, उसका उपयोग कैसे करें। यह हम गांधीजी से सीख सकते हैं।

 

 

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